
छत्तीसगढ़ में सरकार जहाँ एक ओर बड़े-बड़े दावे करती नहीं थकती कि “दिव्यांग और गरीब परिवारों को हर संभव सुविधा दी जा रही है”, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। नुनेरा ग्राम पंचायत के 21 वर्षीय दिव्यांग युवक बबलू पिता चदराम रोहिदास और उसकी नाबालिग बहन 15 वर्षीय बिंदिया की हालत देखकर किसी का भी दिल पसीज जाए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिस प्रशासन को इनकी सुध लेनी चाहिए, वही इनके जीवन से खिलवाड़ कर रहा है।
बबलू और बिंदिया के माता-पिता का कोरोना काल में निधन हो गया। दादी और दादा पहले से ही अशक्त और बीमार हैं। ऐसे हालात में यह भाई-बहन ही उनके सहारे हैं। लेकिन सरकार की योजनाओं का लाभ उन्हें अब तक नहीं मिला। न तो अब तक राशन कार्ड बनाया गया, न पेंशन की सुविधा मिली और न ही किसी प्रकार की दिव्यांग सहायता। गाँव की सरपंच से लेकर ब्लॉक तक, इन बच्चों ने कई बार गुहार लगाई। जवाब मिला—“तुम्हारा काम नहीं बनेगा।” यह कैसा तंत्र है जहाँ एक अनाथ और दिव्यांग परिवार की तकलीफ़ को महज़ मज़ाक बनाकर टाल दिया जाता है?
सब्र का बांध टूटने पर बबलू 50 किलोमीटर दूर से जिला पंचायत कार्यालय पहुंचा। वहाँ उसने अपनी पीड़ा जिला पंचायत सीईओ और मंत्रियों तक पहुँचाने की कोशिश की। लेकिन अफसोस, उसकी फरियाद सुनने के बजाय अधिकारियों ने बेरुखी और लापरवाही का रवैया दिखाया। यहाँ तक कि जिला पंचायत सीईओ ने खुद उससे बात करके भी उसकी परेशानी को नज़रअंदाज कर दिया। यह प्रशासन की असंवेदनशीलता का शर्मनाक उदाहरण है।
जब मीडिया कर्मी वहाँ पहुँचे तो अचानक ही प्रशासन की “नींद” खुली। आनन-फानन में दिव्यांग गाड़ी देने का नाटक किया गया ताकि भ्रष्टाचार और लापरवाही को ढंका जा सके। लेकिन यह गाड़ी भी आधे-अधूरे इंतज़ाम और औपचारिकता भर निकली। यह साफ़ हो गया कि प्रशासन असल में दिव्यांगों की मदद नहीं करना चाहता, बल्कि अपनी छवि बचाने के लिए छलावा कर रहा है।
समाज कल्याण विभाग और पंचायत प्रशासन के लाख दावों के बावजूद आज भी बबलू और उसकी बहन मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। यह न केवल भ्रष्टाचार का घिनौना चेहरा उजागर करता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि शासन की योजनाएँ केवल कागज़ों पर सीमित हैं। सवाल यह उठता है कि जब जिला स्तर पर बैठे अधिकारी ही इतने असंवेदनशील और भ्रष्ट हैं तो गाँव के गरीब, अनाथ और दिव्यांग बच्चों का भविष्य कौन सुरक्षित करेगा?
यह प्रकरण प्रशासन की नाकामी ही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का ज्वलंत उदाहरण है। एक ओर सरकार जनता के सामने कल्याणकारी योजनाओं का गुणगान करती है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी अमला उन योजनाओं को लागू करने में ही भ्रष्टाचार और लापरवाही करता है। यदि 21 वर्षीय दिव्यांग युवक और उसकी 15 वर्षीय बहन जैसी संवेदनशील स्थिति में फंसे लोग भी न्याय और सुविधा से वंचित रह जाएँ तो फिर यह प्रशासन किसके लिए काम कर रहा है?
अब ज़रूरत है कि शासन तत्काल संज्ञान ले, बबलू और बिंदिया को तत्काल राहत पहुँचाई जाए और संबंधित अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई हो। यह मामला केवल दो अनाथ बच्चों की कहानी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ प्रशासन के भ्रष्ट और अमानवीय रवैये का आईना है।


















