
संवाददाता : प्रेम सागर पंथ
जगदलपुर। बस्तर अंचल में परंपरागत चिकित्सा पद्धति और स्थानीय वैद्यों को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने की मांग लगातार तेज होती जा रही है। सामाजिक एवं जनसंगठनों का कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों में वर्षों से जड़ी-बूटी और पारंपरिक उपचार पद्धति के माध्यम से लोगों का इलाज करने वाले वैद्य आज भी ग्रामीण समाज की पहली पसंद बने हुए हैं, लेकिन उन्हें सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं और संस्थागत व्यवस्था में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है।
इसी क्रम में विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं जनप्रतिनिधियों ने मांग उठाई है कि परंपरागत वैद्यों को सीधे आयुष्मान भारत योजना से जोड़ा जाए, ताकि ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो सकें। साथ ही आयुर्वेद अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में अनुभवी वैद्यों की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता जताई गई है।
जानकारों का मानना है कि बस्तर सहित छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी इलाकों में पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आज भी प्रभावी रूप से प्रचलित है। जंगलों में उपलब्ध औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों की जानकारी रखने वाले वैद्य वर्षों से लोगों का उपचार करते आ रहे हैं। ऐसे में यदि उन्हें सरकारी स्वास्थ्य ढांचे से जोड़ा जाता है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और मजबूत हो सकती है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान और आयुर्वेदिक पद्धति को भी बढ़ावा देने की जरूरत है। इसके लिए सरकार को विशेष नीति बनाकर परंपरागत वैद्यों का पंजीयन, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य योजनाओं में समावेश सुनिश्चित करना चाहिए।
क्षेत्रीय स्तर पर यह भी मांग उठ रही है कि आयुर्वेद अस्पतालों में स्थानीय वैद्यों को सलाहकार अथवा सहयोगी भूमिका दी जाए, ताकि पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान संरक्षित हो सके और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके। ग्रामीणों का कहना है कि इससे स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसा बढ़ेगा और दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को समय पर उपचार मिल सकेगा।

परंपरागत वैद्यों को आयुष्मान योजना से जोड़ने की मांग तेज, आयुर्वेद अस्पतालों में भूमिका तय करने की उठी आवाज">

















