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बस्तर में शांति केवल बंदूक से नहीं, संविधान और जनअधिकारों के सम्मान से आएगी — महेश स्वर्ण

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Written by
Sanjana Dewangan

जगदलपुर/बस्तर, 18 मई 2026। केंद्रीय गृह मंत्री के प्रस्तावित बस्तर दौरे के बीच लेबर पार्टी ऑफ इंडिया, छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष एवं लोकसभा क्षेत्र क्रमांक 09 महासमुंद के प्रत्याशी महेश स्वर्ण “एबोरिजिनल ट्राइब्स!” ने केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि बस्तर में स्थायी शांति केवल सुरक्षा बलों, कैंपों और बंदूकों से नहीं, बल्कि संविधान, जनअधिकारों और आदिवासी स्वाभिमान के सम्मान से ही स्थापित हो सकती है।

महेश स्वर्ण ने कहा कि बस्तर कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहाँ आदिवासियों की जमीन, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों को कुचलकर विकास का मॉडल थोपा जाए। उन्होंने कहा कि बस्तर भारत की मूलनिवासी चेतना, प्राकृतिक संपदा और लोकतांत्रिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है। यदि सरकार वास्तव में शांति और विकास चाहती है, तो उसे सैन्य दृष्टिकोण छोड़कर संवैधानिक न्याय के रास्ते पर चलना होगा।

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उन्होंने वर्षों से जारी सुरक्षा अभियानों पर प्रश्न उठाते हुए पूछा कि क्या बस्तर के आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकार मिले? क्या पाँचवीं अनुसूची का सही ढंग से पालन हुआ? क्या पेसा कानून के तहत ग्रामसभाओं को वास्तविक अधिकार दिए गए? क्या जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों का नियंत्रण सुनिश्चित किया गया?

महेश स्वर्ण ने कहा कि यदि सरकार केवल आवाजों को दबाकर शांति स्थापित करना चाहती है, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों का दमन होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “बस्तर में स्थायी शांति बंदूक, कैंप और खनन परियोजनाओं से नहीं आएगी। शांति तब आएगी जब आदिवासी समाज को सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वशासन का अधिकार मिलेगा।”

उन्होंने आरोप लगाया कि विकास के नाम पर बड़े कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि स्थानीय समुदाय विस्थापन, बेरोजगारी और सांस्कृतिक संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने मांग की कि पाँचवीं अनुसूची और पेसा कानून को पूरी तरह लागू किया जाए, ग्रामसभा की अनुमति के बिना भूमि अधिग्रहण पर रोक लगे, वनाधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन हो तथा स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता दी जाए।

बस्तर की जनता से अपील करते हुए महेश स्वर्ण ने कहा कि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ जनता की भागीदारी और सम्मान है। उन्होंने कहा, “जल, जंगल, जमीन और जनसम्मान ही बस्तर की आत्मा है। जो बस्तर की आत्मा को बचाएगा, वही भारत के संविधान और लोकतंत्र को बचाएगा।”

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