
मरवाही में भ्रष्टाचार का आरोप, अब पोड़ी उपरोड़ा में मनमानी जारी
कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा:
विकासखंड पोड़ी उपरोड़ा के खंड शिक्षा अधिकारी के. राजेश्वर दयाल इन दिनों शिक्षकों पर कार्रवाई को लेकर चर्चाओं में हैं। एक ओर जहां वे स्कूलों का औचक निरीक्षण कर लापरवाह शिक्षकों को नोटिस थमाने में जुटे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर उनके इस एक्शन मोड की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बीईओ दयाल की सक्रियता पहली नज़र में तो शिक्षा व्यवस्था सुधारने की दिशा में कदम लगती है, परंतु विभागीय सूत्रों का दावा है कि कार्रवाई “नोटिस” तक ही सीमित रह जाती है। निरीक्षण के बाद अधिकांश मामलों में आगे की फाइलें जिला शिक्षा अधिकारी तक नहीं पहुंचतीं, बल्कि “मामला टेबल पर ही निपटा” दिए जाने की चर्चाएं आम हैं।
नोटिस के पीछे छिपा सौदेबाज़ी का खेल?
स्थानीय शिक्षकों का कहना है कि बीईओ द्वारा बार-बार नोटिस जारी किए जाने के बावजूद किसी शिक्षक पर ठोस विभागीय कार्रवाई नहीं होती। इससे यह संदेह गहराने लगा है कि “नोटिस” शिक्षा सुधार का औज़ार नहीं, बल्कि वसूली का माध्यम बन चुका है। शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी जहां केवल योजनाओं की समीक्षा तक सीमित हैं, वहीं जमीनी स्तर पर स्कूलों की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है।
मरवाही से लेकर पोड़ी उपरोड़ा तक विवादों से घिरे दयाल
यह कोई पहला मौका नहीं है जब बीईओ दयाल की कार्यशैली पर सवाल उठे हों।
मरवाही में प्रभारी बीईओ के रूप में पदस्थ रहते हुए उन पर समग्र शिक्षा अभियान की लगभग पाँच लाख रुपये की राशि अनियमित रूप से आहरण करने का आरोप लगा था। जनपद उपाध्यक्ष की शिकायत पर बिलासपुर संभाग के संयुक्त संचालक ने दो सदस्यीय जांच समिति गठित की थी, जिसमें शिकायत सही पाई गई थी। दबाव बढ़ने पर उक्त राशि बाद में लौटाई गई और उन्हें मरवाही से हटा दिया गया था।
अब वही अधिकारी पोड़ी उपरोड़ा में पदस्थ हैं, जहां उनके कामकाज को लेकर फिर से मनमानी और पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। कई शिक्षक गुपचुप चर्चा कर रहे हैं कि बीईओ साहब “कठोर अधिकारी” की छवि बनाए रखने के साथ-साथ “दयालु निपटान” की नीति पर चल रहे हैं।
शिक्षा व्यवस्था की साख दांव पर
विकासखंड में शिक्षा की गुणवत्ता गिरने के लिए जहां शिक्षकों की लापरवाही जिम्मेदार है, वहीं विभागीय अधिकारियों का दोहरा रवैया भी बड़ा कारण बनता जा रहा है। यदि निरीक्षण के बाद वास्तविक कार्रवाई नहीं होती, तो पूरा अभियान केवल दिखावा बनकर रह जाता है।
अब देखना यह होगा कि जिला शिक्षा अधिकारी और विभागीय उच्चाधिकारी बीईओ दयाल की कार्यशैली पर कब तक आंख मूंदे रहते हैं या फिर इन चर्चाओं पर कोई ठोस कदम उठाया जाएगा।




















