
लौंगदास महंत
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM)। ग्राम बसंतपुर की विवादित भूमि से जुड़े मामले में अब ऑनलाइन राजस्व अभिलेखों और नामांतरण पंजियों ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। उपलब्ध दस्तावेजों, ऑनलाइन रिकॉर्ड और स्थानीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह मामला केवल जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजस्व अभिलेखों में कथित हेरफेर, संदिग्ध नामांतरण और प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
ऑनलाइन रिकॉर्ड से सामने आई पूरी श्रृंखला
राजस्व विभाग की ऑनलाइन नामांतरण पंजियों के अनुसार:
1. 08 अप्रैल 2021
छोगरिया से के नाम भूमि का नामांतरण दर्ज किया गया।
2. 21 नवंबर 2022
जीवन सिंह राठौर द्वारा अपनी पत्नी देववती राठौर के पक्ष में दान पत्र के आधार पर नामांतरण किया गया।
3. 16 मार्च 2023
देववती राठौर से अजय कुमार अग्रवाल के नाम विक्रय पत्र के माध्यम से भूमि हस्तांतरित की गई।
4. वर्ष 2024
तत्कालीन तहसीलदार के आदेश से पुनः नामांतरण की कार्रवाई दर्ज होना ऑनलाइन अभिलेखों में प्रदर्शित हो रहा है।
इन सभी दस्तावेजों की उपलब्धता यह दर्शाती है कि भूमि से संबंधित प्रत्येक चरण राजस्व प्रणाली में विधिवत दर्ज किया गया।
सबसे अहम सवाल: यदि जमीन शासकीय थी, तो यह सब कैसे हुआ?
सूत्रों के अनुसार संबंधित भूमि खसरा नंबर 1/44, रकबा लगभग 3.11 एकड़ है, जिसे रिकॉर्ड में “बड़े झाड़ जंगल मद” श्रेणी की भूमि बताया जा रहा है। ऐसी भूमि सामान्यतः शासकीय प्रकृति की मानी जाती है।
यदि यह तथ्य जांच में सही सिद्ध होता है, तो निम्न प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं—
- निजी व्यक्तियों के नाम नामांतरण कैसे हुआ?
- विक्रय एवं दान पत्रों का पंजीयन किस आधार पर हुआ?
- राजस्व अधिकारियों ने रिकॉर्ड का सत्यापन कैसे किया?
- आपत्ति के बाद निरस्त नामांतरण पुनः क्यों स्वीकृत किया गया?
“जीवन सिंह राठौर कनेक्शन” क्यों बना केंद्रीय मुद्दा?
पूरे लेन-देन की श्रृंखला में एक प्रमुख कड़ी के रूप में सामने आते हैं। भूमि पहले उनके नाम आई, फिर उन्होंने पत्नी के नाम दान किया और उसके बाद भूमि तीसरे पक्ष को विक्रय कर दी गई।
सूत्रों का दावा है कि अधिकार अभिलेख में कथित बदलाव के बाद ही यह पूरी प्रक्रिया संभव हो सकी। हालांकि इन तथ्यों की अंतिम पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही होगी।
प्रशासनिक कार्रवाई पर उठते गंभीर प्रश्न
शिकायतों के बाद प्रारंभिक स्तर पर नामांतरण निरस्त किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बावजूद बाद में पुनः नामांतरण दर्ज होना यह संकेत देता है कि मामले में निर्णय प्रक्रिया विवादों के घेरे में है।
ऑनलाइन उपलब्ध आदेशों ने यह प्रश्न और गहरा कर दिया है कि:
- क्या सभी तथ्य अधिकारियों के संज्ञान में थे?
- क्या नियमों का पूर्ण पालन किया गया?
- क्या आपत्तियों की पर्याप्त जांच हुई?
जिला प्रशासन की चुप्पी पर चर्चा तेज
इतने संवेदनशील मामले में अभी तक अंतिम और स्पष्ट प्रशासनिक कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने से स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज है। यदि दस्तावेजों और सूत्रों द्वारा बताए गए तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह मामला राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: अब केवल जांच नहीं, जवाबदेही तय होना जरूरी
बसंतपुर जमीन कांड अब सिर्फ एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा, राजस्व प्रशासन की पारदर्शिता और अधिकारियों की जवाबदेही की परीक्षा बन गया है।
ऑनलाइन रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि विवादित भूमि का नामांतरण और हस्तांतरण कई चरणों में हुआ। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि भूमि की प्रकृति विवादित थी, तो यह पूरी प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ती रही।
अब जनता की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। यदि जांच में अनियमितताएं सिद्ध होती हैं, तो जिम्मेदार व्यक्तियों और अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की अपेक्षा स्वाभाविक है। अन्यथा यह मामला भी व्यवस्था पर उठते सवालों के साथ समय के गर्त में खो सकता है।
(अस्वीकरण: यह समाचार उपलब्ध ऑनलाइन राजस्व अभिलेखों, दस्तावेजों और स्थानीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। प्रकरण के संबंध में अंतिम निष्कर्ष सक्षम प्रशासनिक अथवा न्यायिक जांच के पश्चात ही निर्धारित होंगे।)

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