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पिपरिया धान मंडी में भ्रष्टाचार बेलगाम, प्रशासन की सख्ती के बावजूद कर्मचारियों की मनमानी से किसान त्रस्त

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Laung das Mahant

 

पसान तहसीलदार की सक्रियता पर भारी पड़ रहा मंडी का भ्रष्ट तंत्र

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कोरबा | पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड

छत्तीसगढ़ शासन और जिला प्रशासन जहां धान खरीदी व्यवस्था को पारदर्शी, सुचारु और किसान हितैषी बनाने के लिए लगातार सख्त निर्देश दे रहा है, वहीं पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड की पिपरिया धान मंडी में कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों की मनमानी इन प्रयासों पर पानी फेरती नजर आ रही है। आदिवासी और छोटे किसानों के साथ हो रहा व्यवहार न केवल अमानवीय है, बल्कि शासन की मंशा के भी सीधे तौर पर खिलाफ है।

किसानों को जानबूझकर परेशान करने का आरोप

धान बेचने पहुंचे किसानों का कहना है कि मंडी में पर्ची वितरण से लेकर तौल तक उन्हें बेवजह घंटों घुमाया जाता है। कभी “अभी रुको”, कभी “बाद में आना” तो कभी “वहां जाकर पूछो”—इसी असमंजस में किसान सुबह से रात तक मंडी परिसर में खड़े रहने को मजबूर हैं।
न पीने के पानी की व्यवस्था, न बैठने की जगह और न ही छांव—सरकारी उपार्जन केंद्र में किसानों की यह दुर्दशा बेहद चिंताजनक है।

किसानों से कराया जा रहा कर्मचारियों का काम

सूत्र बताते हैं कि मंडी में बोरा उठाने, लाइन लगाने और इधर-उधर धान ले जाने जैसे काम किसानों से ही कराए जा रहे हैं। जो किसान सवाल उठाता है या विरोध करता है, उसे और अधिक परेशान किया जाता है। यह स्थिति साफ तौर पर किसानों को मानसिक रूप से तोड़ने और चुप कराने की रणनीति को दर्शाती है।

तौल में अधिक लेने की गंभीर शिकायत

पर्ची से लेकर तौल तक अव्यवस्था
धान बेचने पहुंचे किसानों ने बताया कि पर्ची वितरण के नाम पर उन्हें सुबह से रात तक भटकाया जाता है। कभी “आज नहीं होगा”, कभी “कल आना”, तो कभी “दूसरे काउंटर में पूछो”—इसी उहापोह में पूरा दिन निकल जाता है।
मंडी परिसर में न बैठने की व्यवस्था है, न पीने का पानी और न ही छांव, जिससे किसान भूखे-प्यासे खड़े रहने को मजबूर हैं।

🔸 सवालों से बचते दिखे मंडी के जिम्मेदार
जब हमारी टीम ने मंडी प्रबंधन एवं जीवामदार अधिकारी से इन आरोपों पर बात करनी चाही, तो स्पष्ट जवाब देने के बजाय गोलमोल बातें की गईं।
कभी कहा गया—“बाहर हूं”, कभी—“यहीं हूं”, तो कभी—“इधर से देख रहा हूं।”
जिम्मेदार अधिकारियों का इस तरह सवालों से बचना खुद ही किसी बड़ी गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।

यही वजह है कि प्रशासन की सख्ती के बावजूद किसानों की परेशानी कम नहीं हो पा रही। किसानों ने तौल प्रक्रिया में निर्धारित मात्रा से अधिक धान लिए जाने की शिकायत भी की है। लंबी प्रतीक्षा, दबाव और मजबूरी के चलते अधिकांश किसान आवाज नहीं उठा पाते। यह सीधे तौर पर आदिवासी किसानों के शोषण का मामला बनता है।

सवालों से भागते रहे मंडी के जिम्मेदार

जब हमारी टीम ने मंडी प्रबंधन और जीवामदार अधिकारी से किसानों की शिकायतों को लेकर संपर्क करने का प्रयास किया, तो स्पष्ट जवाब देने के बजाय गोलमोल बातें की गईं
कभी कहा गया—“बाहर हूं”, कभी—“इधर ही हूं”, तो कभी—“यहीं से देख रहा हूं।”
इस तरह के टालमटोल भरे जवाब यह संकेत देते हैं कि मंडी में सब कुछ ठीक नहीं है। यदि व्यवस्था दुरुस्त होती, तो जिम्मेदार अधिकारी खुलकर जवाब देने से क्यों बचते?

प्रशासन की कार्यशैली निष्पक्ष, पर कर्मचारी बन रहे बाधा

स्थानीय किसानों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि पसान तहसीलदार एवं प्रशासनिक अमला अपने स्तर पर सक्रिय और शासन के पक्ष में निष्पक्ष रूप से कार्य कर रहा है, लेकिन पिपरिया धान मंडी के कुछ कर्मचारी उनकी मंशा को पलीता लगा रहे हैं।
यही कारण है कि किसानों की परेशानी खत्म होने का नाम नहीं ले रही।

अब कार्रवाई नहीं हुई तो उठेंगे बड़े सवाल

पिपरिया धान मंडी की मौजूदा स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या किसानों का शोषण यूं ही चलता रहेगा?
अब आवश्यकता है कि जिला प्रशासन सख्ती से जांच कर मंडी के भ्रष्ट कर्मचारियों पर ठोस कार्रवाई करे, ताकि यह संदेश जाए कि किसानों को प्रताड़ित करने वालों के लिए व्यवस्था में कोई जगह नहीं है।

यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह माना जाएगा कि जमीनी स्तर पर बैठे कुछ भ्रष्ट कर्मचारी शासन की किसान हितैषी नीतियों को जानबूझकर नुकसान पहुंचा रहे हैं—जो किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

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