
किसानों की मेहनत की कमाई पर सरकारी तंत्र की चुप्पी में डाका, 41 किलो 400 ग्राम की अवैध कटौती से खुला भ्रष्टाचार
जांजगीर–चांपा | बलौदा विकासखंड
छत्तीसगढ़ शासन की धान खरीदी व्यवस्था बलौदा विकासखंड अंतर्गत सेवा सहकारी समिति मर्यादित पहरिया (पंजीयन क्रमांक 639) के धान उपार्जन केंद्र पहरिया में पूरी तरह ध्वस्त नजर आ रही है। यहां सरकारी नियम नहीं, बल्कि भ्रष्ट अधिकारियों की मनमानी चल रही है, जहां किसानों की मेहनत की कमाई को खुलेआम लूटा जा रहा है।

मिली जानकारी के अनुसार इस उपार्जन केंद्र में प्रति बोरा 41 किलो 400 ग्राम की अवैध खरीदी की जा रही है, जो सीधे-सीधे शासन के स्पष्ट निर्देशों का उल्लंघन है। जो किसान तय मात्रा से कम धान लाता है, उसे खरीदी से वंचित करने, धान वापस करने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की धमकी दी जाती है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध है।
किसानों के लिए नरक बना उपार्जन केंद्र
धान बेचने पहुंचे किसानों को यहां ना वाहन सुविधा, ना बैठने की व्यवस्था, ना पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं मिलती हैं। घंटों लाइन में खड़े किसान अपमान और डर के माहौल में धान बेचने को मजबूर हैं। इस स्थिति का फायदा उठाकर भोले-भाले ग्रामीण किसानों और महिलाओं को ठगा जा रहा है।
बोरा पलटी और अवैध वसूली का खुला खेल
ग्रामीणों ने बताया कि यहां किसानों से जबरन बोरा पलटी करवाई जाती है। हमाली के नाम पर प्रति बोरा ₹3 की अवैध वसूली की जाती है। जो किसान पैसे देने से मना करता है, उससे कहा जाता है कि “खुद काम करो, नहीं तो धान वापस ले जाओ।”
यह सवाल उठना लाजिमी है कि— क्या सरकारी खरीदी केंद्र अब जबरन वसूली के अड्डे बन चुके हैं?
अलग बोरी, अलग शिफ्ट – भ्रष्टाचार का नया तरीका
धान बेचने आईं कई महिलाओं और किसानों ने बताया कि जानबूझकर ज्यादा तौल ली जाती है, फिर आधी बोरी अलग शिफ्ट कर अपने लिए निकाल ली जाती है। यह खेल इस साल ही नहीं, बल्कि पिछले साल भी बेरोकटोक चलता रहा, लेकिन किसी जिम्मेदार अधिकारी ने आज तक जांच करने की जहमत नहीं उठाई।
खुले मैदान में सरकारी धान – नुकसान की भरपाई किसानों से
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खरीदा गया धान खुले जमीन में असुरक्षित तरीके से रखा जा रहा है। बारिश, नमी और नुकसान का सारा जोखिम किसानों से ज्यादा तौल लेकर पूरा किया जा रहा है। यानी सरकारी व्यवस्था की नाकामी की कीमत भी किसान ही चुका रहा है।
प्रशासन की चुप्पी संदेह के घेरे में
इतने गंभीर आरोपों के बावजूद प्रशासन का मौन रहना कई सवाल खड़े करता है। क्या अधिकारी अनजान हैं या फिर जानबूझकर आंख मूंदे बैठे हैं?
अगर यह सब अधिकारियों की जानकारी में हो रहा है, तो यह सीधा-सीधा संरक्षण में चल रहा भ्रष्टाचार माना जाएगा।
अब जवाबदेही तय हो
यह खबर शासन-प्रशासन से सीधे सवाल करती है—
41 किलो 400 ग्राम की अवैध खरीदी का आदेश किसने दिया?
बोरा पलटी और ₹3 प्रति बोरा वसूली पर कार्रवाई क्यों नहीं?
खुले मैदान में रखे धान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
पिछले साल की अनियमितताओं पर जांच क्यों नहीं हुई?
यदि तत्काल जांच, जिम्मेदार अधिकारियों का निलंबन और आपराधिक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ हो जाएगा कि किसानों की मेहनत की कमाई लूटने वालों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है।


















