
शासकीय जमीन पर खुला खेल!
कोरबा/पाली।
कोरबा जिले के पाली विकासखंड अंतर्गत एवं बिलासपुर जिला सीमा से सटे ग्राम शिवपुर में शासकीय भूमि घोटाले का एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार रोड़ों की लागत से स्थापित किए जा रहे निजी ग्रीन चुल बायो प्लांट के नाम पर बड़े झाड़ की शासकीय भूमि पर सुनियोजित तरीके से कब्जा कर लिया गया है। आरोप है कि पंचायत से मात्र 6 एकड़ भूमि की एनओसी लेकर करीब 15 एकड़ शासकीय बड़े झाड़ की जमीन पर अवैध कब्जा कर न केवल निर्माण कार्य कराया जा रहा है, बल्कि खुलेआम अवैध खनन और पट्टे की भूमि की खरीद-फरोख्त भी की जा रही है।
यह पूरा मामला ग्राम शिवपुर के खसरा नंबर 541 से जुड़ा है, जो राजस्व अभिलेखों में बड़े झाड़ की शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है। सूत्रों के अनुसार, इस भूमि के कुछ हिस्से में वर्ष 2000 के आसपास वन विभाग द्वारा पौधारोपण भी कराया गया था। इसके बावजूद भू-माफियाओं और राजस्व अमले की मिलीभगत से खसरा नंबर, रकबा, चौहद्दी और किसान किताब में भारी छेड़छाड़ कर शासकीय भूमि को निजी दर्शाया गया।
बताया जा रहा है कि करोड़ों के इस प्रोजेक्ट को अवैध लाभ पहुंचाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। खसरा नंबर 541 के रकबे में हेरफेर कर कूटरचित रिकॉर्ड बनाए गए, ताकि शासकीय बड़े झाड़ की जमीन को निजी भूमि साबित किया जा सके। यही नहीं, जिस भूमि पर निर्माण किया जा रहा है, वहां लगे साजा, सराई सहित सैकड़ों पेड़ों को निर्ममता से काटकर जमीन समतल कर दी गई, जो सीधे-सीधे वन एवं पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन है।
जानकारों का कहना है कि बड़े झाड़ के जंगल भूमि की न तो रजिस्ट्री हो सकती है, न सीमांकन, न बटांकन। वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा-2 के तहत राजस्व दस्तावेजों में बड़े झाड़ के रूप में दर्ज भूमि का आवंटन केंद्र सरकार की अनुमति के बिना संभव ही नहीं है। यहां तक कि इस विषय में उच्चतम न्यायालय भी स्पष्ट आदेश दे चुका है। बावजूद इसके, ग्राम शिवपुर में नियम-कानून को ताक पर रखकर पूरा खेल अंजाम दिया गया।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गंभीर भूमि घोटाले की शिकायतें स्थानीय कृषक भूमि स्वामियों द्वारा राजस्व अधिकारियों और जिला प्रशासन से की जा चुकी हैं, लेकिन अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
यह मामला सिर्फ अवैध कब्जे का नहीं, बल्कि शासकीय जमीन की खुली लूट, राजस्व रिकॉर्ड में सुनियोजित कूटरचना और भू-माफियाओं को संरक्षण देने का प्रतीक बन चुका है। यदि इस प्रकरण की निष्पक्ष, ईमानदार और उच्चस्तरीय जांच कराई जाती है, तो शासकीय जमीन घोटाले की परत-दर-परत सच्चाई उजागर होना तय है।
अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन इस गंभीर मामले पर कब तक आंख मूंदे रहता है या फिर भू-माफियाओं और उनके संरक्षकों पर सख्त कार्रवाई कर कानून का राज स्थापित करता है।
के रूप में भी तैयार कर सकता हूँ।



















