
कोडरमा। लोक आस्था का महापर्व छठ कल से नहाय-खाय के साथ शुरू हो रहा है। सूर्य उपासना के इस महान पर्व को लेकर पूरे प्रदेश में उत्साह और श्रद्धा का माहौल है। घरों में साफ-सफाई से लेकर घाटों की सजावट तक, हर ओर तैयारी जोरों पर है। बाजारों में छठ सामग्री की दुकानें सज चुकी हैं, और इसी के साथ सूप-दउरा की बिक्री भी चरम पर पहुंच गई है।
छठ पर्व में बांस से बने सूप और दउरा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है। इन्हीं सूप-दउरा में व्रती सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। आधुनिकता के इस दौर में जहां कांसे, पीतल, चांदी और प्लास्टिक के सूप मिलने लगे हैं, वहीं बांस से बने सूप और दउरा की पवित्रता और पारंपरिक पहचान आज भी बरकरार है।
इसी परंपरा को जीवित रखने का काम कर रहा है कोडरमा जिले के झुमरीतिलैया नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड नंबर 7 का तुरिया समाज, जो पिछले एक महीने से इन सामग्रियों को तैयार करने में जुटा है। इस काम में करीब 40 परिवार दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। इन परिवारों की महिलाओं ने अपने घरों को ही कारीगरी का केंद्र बना लिया है, जहां बांस को काटकर, सुखाकर और आकार देकर सुंदर सूप और दउरा बनाए जा रहे हैं।

तुरिया समाज के बुजुर्ग सदस्य बताते हैं कि “हमारे पूर्वजों के समय से यह परंपरा चली आ रही है। छठ पर्व के पहले हमारे बनाए सूप-दउरा की मांग कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग और यहां तक कि बिहार के कई जिलों से भी आती है।”
इस वर्ष बिक्री में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी जा रही है। बाजारों में बांस के बने सूप-दउरा की कीमत 100 रुपये से लेकर 500 रुपये तक पहुंच गई है। कई व्यापारी गांवों में आकर bulk ऑर्डर दे रहे हैं। महिलाओं का कहना है कि इस काम से उन्हें न सिर्फ आर्थिक सहारा मिला है, बल्कि परंपरा को आगे बढ़ाने का गर्व भी महसूस हो रहा है।
छठ पर्व के अवसर पर तैयार किए जाने वाले सूप और दउरा सिर्फ एक पूजा सामग्री नहीं, बल्कि परिवार, संस्कृति और आस्था के प्रतीक हैं। जब महिलाएं सूर्य देव की उपासना के दौरान इन्हें जल में डुबोकर अर्घ्य देती हैं, तो वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक परंपरा की डोर को मजबूत करती हैं।
स्थानीय प्रशासन ने भी घाटों पर साफ-सफाई, प्रकाश व्यवस्था और सुरक्षा के इंतज़ाम तेज़ कर दिए हैं। नगर परिषद की टीमें लगातार घाटों का निरीक्षण कर रही हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो।
तुरिया समाज की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि भले ही समय बदले, लेकिन आस्था की जड़ें कभी नहीं हिलतीं। बांस की खुशबू से सजे ये सूप और दउरा न केवल पूजा की तैयारी हैं, बल्कि यह हमारी लोक संस्कृति का जीवंत प्रतीक हैं — जो हर साल छठ के साथ नए सिरे से जन्म लेती है।




















