
कोरबा। शिक्षा विभाग की साख को धूमिल करने वाले मामलों में अब सबसे बड़ा नाम सामने आ रहा है ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) के.आर. दयाल का। दयाल पर गंभीर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए ऐसे आदेश जारी किए, जिनका अधिकार उन्हें बिल्कुल भी नहीं था। यही कारण है कि अब उनकी कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है और क्षेत्र में यह आवाज़ बुलंद हो रही है कि उन्हें तत्काल निलंबित किया जाना चाहिए।
नियमों की धज्जियाँ उड़ाने का खेल
ताजा मामला कन्या शाला आश्रम तुमान और केंदहाडांड स्कूल से जुड़ा है। दोनों जगह लगभग 50 किलोमीटर की दूरी है, लेकिन बीईओ दयाल ने एक ही व्यक्ति को दोनों जगह पदस्थापना की अनुमति दे डाली। यह अनुमति देना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था। नियम स्पष्ट है कि इस तरह की अनुमति केवल सहायक आयुक्त आदिवासी विकास ही दे सकते हैं। बावजूद इसके दयाल ने अपने स्तर पर आदेश जारी कर विभागीय नियमों की पूरी तरह से धज्जियाँ उड़ाई।
भ्रष्टाचार का गहरा शक
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि संबंधित अधीक्षिका दोनों जगह हाजिरी दर्ज कर रही हैं तो इसका सीधा मतलब यह है कि वेतन और भत्ते भी दोहरी जगह से लिए जा रहे होंगे। यानी सरकारी खजाने से गलत भुगतान हो रहा है। यह भ्रष्टाचार का स्पष्ट संकेत है। इस पूरे खेल की जड़ में बीईओ दयाल ही जिम्मेदार नजर आते हैं, जिन्होंने गैरकानूनी अनुमति देकर इस गड़बड़ी को जन्म दिया।
सहायक आयुक्त की चुप्पी, लेकिन दोषी कौन?
सहायक आयुक्त को मामले की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। हालांकि विभागीय सूत्रों का कहना है कि पूरे प्रकरण की जड़ में बीईओ दयाल की मनमानी और मिलीभगत है। यदि विभाग ने आंखें मूंद रखीं तो इसका सीधा संदेश यही जाएगा कि भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया जा रहा है।
जनता में आक्रोश
स्थानीय लोगों और शिक्षा से जुड़े जागरूक नागरिकों का कहना है कि दयाल जैसे अधिकारी विभाग के लिए कलंक हैं। एक तरफ बच्चों और छात्राओं का भविष्य दांव पर है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारी अपनी मनमानी से नियमों को ताक पर रखकर केवल अपना फायदा साध रहे हैं। जनता का साफ कहना है कि जब तक ऐसे अधिकारी पद पर रहेंगे, तब तक शिक्षा विभाग में पारदर्शिता और ईमानदारी की उम्मीद करना व्यर्थ है।

सस्पेंशन की मांग तेज
अब क्षेत्र में यह मांग जोर पकड़ रही है कि बीईओ के.आर. दयाल को तत्काल निलंबित किया जाए। जनता का कहना है कि विभाग को अपनी साख बचाने के लिए भ्रष्टाचार और मनमानी करने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करनी ही होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह विभाग की पूरी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करेगा।
निष्कर्ष:
बीईओ के.आर. दयाल का मामला शिक्षा विभाग के लिए एक बड़ा कलंक बन चुका है। उनकी मनमानी, गैरकानूनी आदेश और संभावित भ्रष्टाचार विभागीय छवि को बदनाम कर रहे हैं। अब गेंद प्रशासन के पाले में है – क्या दयाल पर कड़ी कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?




















